ममत्व की सरिता
ममत्व की यह निर्मल सरिता ,
हृदय में जिसके अविरल बहती,
वात्सल्य की ऊष्मा पाकर,
यह सृष्टि नित्य ही संवरती ।
अकिंचन सी लगती है दुनिया,
इसके पावन आश्रय बिन,
जीवन की इस विषम डगर पर,
यही तो देती सम्बल, हर दिन।
इसकी तपस्या का आलोक,
अज्ञान तिमिर को हर लेता है,
इसके चरणों का दिव्य स्पर्श,
साहस-सा बल भर देता है।
यह करुणा की अधिष्ठात्री ,
सदा स्नेह का घट छलकाती,
इसके वात्सल्यमयी आँचल में,
विपदा स्वयं विलीन हो जाती।
नश्वर इस संसार के भीतर,
इसका प्रेम ही शाश्वत है,
जो कुछ भी है इस जीवन का,
माँ के चरणों में समर्पित है।
हे जननी! तेरी वंदना में,
ये शब्द भी मौन हो जाते हैं,
तेरी ममता की इस गरिमा को,
हम नतमस्तक होकर गाते हैं।।
✍️योगेंद्र सिंह राजावत

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