कोलाहलपूर्ण इस जीवन में,
परहित की चेतना न जागे।
क्षुधा-पीड़ित जन को देखें,
तो हम कैसे अन्न ग्रहण करें?
यावज्जीवन इस वसुधा पर,
मानवता का प्राण-त्व हो।
अंतःकरण की गहराइयों में,
करुणा की अविरल धारा बहे।
तरु के जैसे फल देकर के,
परोपकार का पाठ पढ़ाएं।
इस वसुधा के उपवन में,
खुशियों की सौगात रहे।
जिसके पास न शयन-वस्त्र हो,
उसको आश्रय-शय्या दें।
परोपकार के इस चिंतन से,
मन में निर्मल भाव बहे।
क्षुधा-पीड़ित को भोजन दें,
तृषा-ग्रस्त को नीर पिलाएं।
दीन-हीन की सेवा करके,
सब के हित में साथ रहे।
वसुंधरा यह बने स्वर्ग सम,
हर्षित सारा संसार रहे।
प्रेम-भाव के इस प्रवाह से,
अमृत-सी बौछार बहे।
✍️ योगेंद्र सिंह राजावत

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