'निर्मल अंतःकरण' हिंदी कविता hindi kavita

 





कोलाहलपूर्ण इस जीवन में,

परहित की चेतना न जागे।

क्षुधा-पीड़ित जन को देखें,

तो हम कैसे अन्न ग्रहण करें?


यावज्जीवन इस वसुधा पर,

मानवता का प्राण-त्व हो।

अंतःकरण की गहराइयों में,

करुणा की अविरल धारा बहे।


तरु के जैसे फल देकर के,

परोपकार का पाठ पढ़ाएं।

इस वसुधा के उपवन में,

खुशियों की सौगात रहे।


जिसके पास न शयन-वस्त्र हो,

उसको आश्रय-शय्या दें।

परोपकार के इस चिंतन से,

मन में निर्मल भाव बहे।


क्षुधा-पीड़ित को भोजन दें,

तृषा-ग्रस्त को नीर पिलाएं।

दीन-हीन की सेवा करके,

सब के हित में साथ रहे।


वसुंधरा यह बने स्वर्ग सम,

हर्षित सारा संसार रहे।

प्रेम-भाव के इस प्रवाह से,

अमृत-सी बौछार बहे।


✍️ योगेंद्र सिंह राजावत 

Previous
Next Post »

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए धन्यवाद | ये पोस्ट आपको कैसी लगी |
इस पोस्ट के बारे में आपकी कोई राय है तो कृपया comment कर बताये ConversionConversion EmoticonEmoticon

Search

How to contact us ?

मान्यवर यदि आप हमें कहानी , कविता या अपने अन्य अमूल्य विचार भेजना चाहते है तो हमे अपने फोटो सहित ई मेल करे- Gyaninnovate@gmail.com जिसे इस साईट पर पोस्ट किया जाएगा | thanks for support us -- Gyaninnovate Group